बात उस समय की है जब,
लोगों के पास मोबाइल फोन
नहीं हुआ करता था। तब
घर परिवार के सभी लोग
एक साथ रहते थे।
उस समय उन लोगों के हाथों
मे कुछ न कुछ कला होती थी।
उस समय वह लोग खाली नहीं
बैठते थे , कुछ न कुछ कला
करते ही रहते थे।साथ बैठकर
खाना खाते थे,एक साथ बैठने
का मजा ही कुछ अलग होता है।
पर अब देखो जब से लोगों के
हाथों में मोबाइल आ गयी है
तब से लोगों को एक साथ
बैठने का मौका ही नहीं
मिलता है।आज का समय
कितना बदल गया है,अब
पहले जैसे लोग नहीं रहे।
अब वह कला लोगों के हाथों,
में नहीं ,जो क ई वर्षों तक मठ
मन्दिरों का निर्माण किया जा ता
था।और पहृले के लोग अपनी
कलाओं का प्रर्दशन करने ,य अपना
हुनर दिखाने का मौका मिलता था।
लोगों के पास मोबाइल फोन
नहीं हुआ करता था। तब
घर परिवार के सभी लोग
एक साथ रहते थे।
उस समय उन लोगों के हाथों
मे कुछ न कुछ कला होती थी।
उस समय वह लोग खाली नहीं
बैठते थे , कुछ न कुछ कला
करते ही रहते थे।साथ बैठकर
खाना खाते थे,एक साथ बैठने
का मजा ही कुछ अलग होता है।
पर अब देखो जब से लोगों के
हाथों में मोबाइल आ गयी है
तब से लोगों को एक साथ
बैठने का मौका ही नहीं
मिलता है।आज का समय
कितना बदल गया है,अब
पहले जैसे लोग नहीं रहे।
अब वह कला लोगों के हाथों,
में नहीं ,जो क ई वर्षों तक मठ
मन्दिरों का निर्माण किया जा ता
था।और पहृले के लोग अपनी
कलाओं का प्रर्दशन करने ,य अपना
हुनर दिखाने का मौका मिलता था।









































