आज के दौर मे ,हर आदमी
वह सब कुछ पा लेना चा हता
हैं, जो उसके सुख सुविधा उपलब्ध हो सके।यदि आज पेड नही लगेंगे तो कल छाया
और फल कैसे मिलेगा।...."
"आज यदि गुणों का सम्मान ,
नही होगा तो कल का समाज,
कैसे होगा"---
"आज यदि भोजन कर रहे हैं,
तो पोस्टिक तो तुरन्त मिल ..
नही जाऐगा।......
अक्सर लोग अतीत मे खोये
रहते हैं....
और आने वाले कल के सपने
बुनते रहते हैं......
जबकि होना वह चाहिए कि हम अतीत की गलतियों से
वतमान मे सबक लेकर
अपने भविष्य को बेहतर बनाऐ।.......।।
आज हर आदमी की अधीरता
प्रबल हो रही हैं.....
वह सब कुछ तुरंत ही पा
लेना चाहता हैं.......
उसे अपने कर्म का ऐसा फल ,
चाहिए जो उसकी कामनाओं को पूरा करने मे सहायक हो...
जो बीत चुका है उसका मोह ,
छोडना सरल नही होता हैं.....
वर्तमान में जीने वालो की
सख्या कम होती हैं....
दूसरो के लिए वह तव ही ,
सोचता है, यदि कोई स्वाहित
सिद्ध होता है.....
वास्तव मे मनुष्य की दृष्टि ,
संकुुुचित होती जा रही हैं....
दृष्टि का यह संकुुुचन धर्म से,
दूर होते जाने का परिणाम है...
प्राचीन..काल मे लोग पेड,
लगाया करते थे,ताकि आने,
्वाली पीढियां इसकी छाया मे,
बैठ सकेे,इसके फल खा सके......
कुऐ खोदेे जाते थे,...
तालाब वनवाऐ जाते थे...
जो किसी अनजान पथिक,
की प्यास बुछा सके.....
इसी तरह हर वह आदमी के लिए मात्र वर्तमा न जीवन,
ही नहीं अगले जीवन को ,
सवांंंर लेने की प्ररेणा थी।
.....एक पौधा लगाना......
.....और उसकी देखभाल करना.....
वह सब कुछ पा लेना चा हता
हैं, जो उसके सुख सुविधा उपलब्ध हो सके।यदि आज पेड नही लगेंगे तो कल छाया
और फल कैसे मिलेगा।...."
"आज यदि गुणों का सम्मान ,
नही होगा तो कल का समाज,
कैसे होगा"---
"आज यदि भोजन कर रहे हैं,
तो पोस्टिक तो तुरन्त मिल ..
नही जाऐगा।......
अक्सर लोग अतीत मे खोये
रहते हैं....
और आने वाले कल के सपने
बुनते रहते हैं......
जबकि होना वह चाहिए कि हम अतीत की गलतियों से
वतमान मे सबक लेकर
अपने भविष्य को बेहतर बनाऐ।.......।।
आज हर आदमी की अधीरता
प्रबल हो रही हैं.....
वह सब कुछ तुरंत ही पा
लेना चाहता हैं.......
उसे अपने कर्म का ऐसा फल ,
चाहिए जो उसकी कामनाओं को पूरा करने मे सहायक हो...
जो बीत चुका है उसका मोह ,
छोडना सरल नही होता हैं.....
वर्तमान में जीने वालो की
सख्या कम होती हैं....
दूसरो के लिए वह तव ही ,
सोचता है, यदि कोई स्वाहित
सिद्ध होता है.....
वास्तव मे मनुष्य की दृष्टि ,
संकुुुचित होती जा रही हैं....
दृष्टि का यह संकुुुचन धर्म से,
दूर होते जाने का परिणाम है...
प्राचीन..काल मे लोग पेड,
लगाया करते थे,ताकि आने,
्वाली पीढियां इसकी छाया मे,
बैठ सकेे,इसके फल खा सके......
कुऐ खोदेे जाते थे,...
तालाब वनवाऐ जाते थे...
जो किसी अनजान पथिक,
की प्यास बुछा सके.....
इसी तरह हर वह आदमी के लिए मात्र वर्तमा न जीवन,
ही नहीं अगले जीवन को ,
सवांंंर लेने की प्ररेणा थी।
.....एक पौधा लगाना......
.....और उसकी देखभाल करना.....
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