है छीनने वाले,
समझते हैं कि...
वह जीत गये ।
झूठ की सीढ़ी पर,
110000 Doller...
चढ़कर ख़ुद को बड़ा मान लेते हैं।
पर वक्त की अदालत...
कभी अंधी नहीं होती।
वहां हर सांस,
हर चाल का हिसाब लिखा जाता है।
आज जो हंसते हैं,
किसी की मजबूरी पर कल वहीं,
आसूं अपने हिस्से लिखवा लेंते है।
इंसाफ देर से सही
पर
आता जरूर है।
क्यों कि
वक्त की कलम से,
कोई
गुनाह
मिटता नहीं है।



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