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शुक्रवार, 15 मार्च 2019

महाराणा प्रताप और संयोगिता

इतिहास गवाह हैं, इन दोनो की प्रेम गाथा, बात उन दिनों की है जब
महाराणाप्रताप दिल्ली केे शाशक
हुुु करते थे। एक समय थाा जब
बडे से बडा यो द्धा महाराणाप्रताप का सामना नही कर पाते थे।
और रणभूमि को  छोड़ भाग खडे  थे। धीरेे धीरेे महाराणाप्रताप की
तस्वीरों के लोग दीवाने हो गयेे। यह बात कन्नौज तक जा पहुंची।
कन्नौज मे राजा जयचंद की पुुत्री
संयोगिता थी।उसने भी महाराणाप्रताप  की तस्वीर को
देेेखने के लीऐ मगवाया।सिपाहियों ने
तसवीर को लाकर सयोगिताा  के
कमरे मे टांग  दिया।
 सयोगिता अपनेे कुछ सहेलियों के
साथ उस तस्वीर को देखने जाती है।
उसने  जैसा  सुना था ,वैैसे उनको
देेेखा भी। और फिर .....
 सयोगिता के मन मे प्ररेम जागने लगा। धीरे धीरे एक दूसरे को खत
के माध्यम से
 अपनी मन की बाते बताने लगेे।
और एक दिन....
 राजा जयजंद ने अपनी पुत्री संंयोगिता के  स्यंवर का ऐलान कर दिया। दूूर दूर सभी रा  जाओ को
बुुुलाया  मगर  महाराणाप्रताप   को
नही बुुुलाया। यह बात  संयोगिता
को पता चली और उसने महाराणा
को चुपके से खत लिखा...
 इधर खत पाते  ही महाराणा प्रताप
ने स्यवर मे आने को कहा....
उधर स्यंवर  मे  संयोगिता  की  ं
आंंंखें    महाराणा  प्रताप
को देख रही थी, पर वह कही
नजर नही आ रहे थे।
सयोगिता  वर   माला  लेकर
जाती  है  और   स्यंवर  मे   खडे
हुुुए  पुुुतले  महाराणाााप्रता प  के
गले  मे  वर   माला  डाल  देती  हैं।
पुुुतले  के   पीछे  खडे  महाराणाप्रताप  संयोगिता   का
हाथ  पकड  स्ययंवर    सेे  लेकर
भाग  जाते  हैं...... और  आगे
इतिहास  गवाह हैं.............।

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तोतला बेटा...

 मां  अपने तोतले बेटे से कहा।      बेटा  आज हम जहां, लड़की देखने जा रहें हैं। तुम वहां बोलना मत ।     वर्ना  वह लोग भी मना कर देंगे।    बेटा...

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