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बुधवार, 13 अगस्त 2025

मेरी बेटी मेरे पास कहानी संग्रह

हिंदी की एक रोचक कहानी....

वह गांव वाली भोली भाली लड़की....

शहर जाकर कुछ ऐसा हुआ....

कुछ आने से मुझे पल....

Desi Kahani in Hindi

Desi Kahani in Hindi : गांव के एक छोटे से घर में सुधा अपने माता पिता के साथ रहती थी। सुधा के पिता किसान थे। उनके पास एक खेत था।

जिसमें वे खेती किया करते थे। सुधा गांव के बच्चों को पढ़ाती थी। जिससे उसे कुछ पैसे मिल जाते थे। इधर गांव में कभी सूखा पड़ जाता था। कभी बाढ़ आ जाती थी। जिससे फसलें नष्ट हो जाती थीं। कभी कभी तो भूखे मरने की नौबत आ जाती थी।

ऐसे में सुधा अपने परिवार को लेकर बहुत परेशान रहती थी। इधर उसके माता पिता उसकी शादी को लेकर बहुत परेशान रहते थे।

सुधा की एक सहेली थी। सपना वह अच्छे सम्पन्न परिवार से थी। उसके पिता ने उसे पढ़ने के लिये शहर भेज दिया। एक बार सपना छुट्ट्यिों में गांव आई –

‘‘सुधा तू इतनी परेशानी उठा रही है तू मेरे साथ शहर चल वहां तुझे मैं नौकरी दिलवा दूंगी। मजे से रहना। घर भी पैसे भेज देना।’’

सुधा ने ध्यान से उसकी बात सुनी बात उसे समझ आ रही थी वैसे भी वह दिन रात परेशान रहती थी, कि अपने परिवार की मदद कैसे करे। सुधा बोली – ‘‘ठीक है मैं पिताजी से बात करके देखती हूं।’’

इस पर सपना ने कहा – ‘‘अरे तू चिंता मत कर मैं अपने पापा से कह दूंगी वो चाचा से बात कर लेंगे। तू मेरे साथ रहेगी तो किसी को तेरी फिक्र भी नहीं होगी।’’

उसी दिन शाम को सुधा ने बात की लेकिन उसके पिता ने मना कर दिया। सुधा बोली – ‘‘पिताजी कब तक यहां भूखे मरते रहेंगे। यहां कुछ नहीं रखा है मुझे जाने दीजिये अगर अच्छी सी नौकरी लग गई तो मैं आपको भी बुला लूंगी।’’

पिताजी बोले – ‘‘नहीं नहीं अब हम तेरी कमाई पर जिन्दा रहेंगे क्या?’’

यह सुनकर सुधा ने कहा – ‘‘इसमें मेरी कमाई की बात कहां से आ गई कुछ दिन की बात है थोड़े पैसे इकट्ठे हो जायें तो आप भी कुछ काम शुरू कर लेना वहां तो छोटी सी रेहड़ी पर सामान बेच कर भी अच्छे पैसे कमाये जा सकते हैं।’’

कुछ ही देर में सपना के पापा भी आ गये वे पढ़े लिये समझदार आदमी थे। उन्होंने सुधा के माता पिता को समझाया तो वे सुधा को शहर भेजने के लिये राजी हो गये।

एक सप्ताह बाद दोंनो सहेलियां शहर आ गईं। सुधा ने कुछ पैसे जोड़ रखे थे। जिससे कुछ दिन काम चल गया। इसी बीच सुधा को एक नौकरी मिल गई। वह ऑफिस जाने लगी। पढ़ी लिखी तो वह थी, लेकिन शहर के तौर तरीके उसे नहीं आते थे। इसलिये वह हमेशा चुपचाप अपने काम में लगी रहती थी।

सुधा का ऑफिस वह घर जिसमें सुधा, सपना के साथ रहती थी। बहुत दूर था। बस से जाने आने में उसे दो घंटे लग जाते थे। शाम को ऑफिस से निकल कर घर आते आते उसे रात हो जाती थी। रात को आवारा लड़के इधर उधर घूमते थे। जिनसे बचते बचाते वह घर पहुंचती थी।

एक दिन सुधा ऑफिस के बाद बस स्टेंड की ओर जा रही थी। तभी पीछे से एक बाईक पर महेश उसके पास आकर रुका। महेश उसके ही ऑफिस में काम करता था और कभी कभी काम में सुधा की मदद भी कर दिया करता था।

वह बोला – ‘‘सुधा घर जा रही हों लेकिन आज तो बसों की हड़ताल है। दोपहर को यहां बस से किसी का एक्सीडेंट हो गया था। पब्लिक ने बस फूंक दी तब से सारे बस वाले हड़ताल पर चले गये।’’

यह सुनकर सुधा डर गई अब वह घर कैसे जायेगी। वह इधर उधर ऑटो ढूंढने लगी लेकिन जो भी ऑटो आ रहा था वह पहले से भरा हुआ था। तब महेश ने कहा – ‘‘सुधा बैठो मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं। बस न होने के कारण आटो पहले से ही भरे हुए आ रहे हैं।’’

सुधा डरते डरते महेश की बाईक पर बैठ गई। कुछ ही देर में दोंनो घर पहुंच गये। सुधा ने महेश से कहा – ‘‘आपका बहुत बहुत धन्यवाद आज आप नहीं होते तो पता नहीं क्या होता।’’

महेश बोला – ‘‘मैं यहां पास ही में रहता हूं और रोज इसी रास्ते से जाता हूं। अगर तुम्हें बुरा न लगे तो मेरे साथ चला करो जाना तो हमें एक ही जगह है फिर बसो में धक्के खाने का क्या फायदा।’’

सुधा झेपते हुए बोली – ‘‘नहीं आप क्यों परेशान हो रहे हैं मैं चली जाउंगी।’’

महेश ने मुस्कुराते हुए कहा – ‘‘अच्छा बाबा तुम्हारा आत्मसम्मान आड़े आ रहा है तो कभी कभी बाईक में पेट्रोल भरवा देना या कभी कभी चाय पिला देना।’’

फिर उसने सीरियस होते हुए कहा – ‘‘देखो सुबह की तो कोई बात नहीं लेकिन रात को यहां गुंडागर्दी शुरू हो जाती है। अन्जान शहर हो तुम अकेली हो अपनी सेफ्टी के बारे में सोचो।’’

सुधा हां कर देती है और मुड़ कर अपने फ्लेट की ओर चल देती है। रात को सुधा सपना को सारी बातें बताती है तो सपना कहती है – ‘‘सुधा अपनी गांव की सोच से बाहर निकल कर दुनिया देख अच्छा खासा दोस्त मिल रहा है। शहरों में यह सब आम बात है। यहां कोई टोकने थोड़े आ रहा है।’’

अगले दिन से सुधा, महेश के साथ ऑफिस जाने लगी धीरे धीरे उनकी नजदीकियां बढ़ने लगीं। दोंनो को एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा। ऑफिस से निकल कर दोंनो इधर उधर घूमते। साथ में काफी पीते बातें करते फिर महेश सुधा को घर छोड़ देता था।

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था। एक दिन सुधा जब घर पहुंची तो देखा उसके पिताजी बैठे थे।

‘‘अरे पिताजी आप कब आये?’’

पिताजी बोले – ‘‘बस बेटा तुझे बहुत समय से देखा नहीं था। इसलिये चला आया। कैसी है तू? और इतनी देर से घर आती है।’’

सुधा को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई वह बोली – ‘‘बाबा शहर में ऐसा ही होता है नौकरी में बहुत काम करना पड़ता है आते आते रात हो जाती है।’’

पिताजी ने चिंता जताते हुए कहा – ‘‘बेटा देख ले नहीं तो घर चल वहां भी तो खर्चा चल ही रहा था। तुझे परेशान देख कर बहुत तकलीफ होती है। तेरी मां भी बहुत परेशान रहती है।’’

यह सुनकर सुधा सकपका गई वह बोली – ‘‘नहीं पिताजी आप परेशान न हों मैं बहुत मजे में हूं। यहां रहना मुझे बहुत अच्छा लग रहा है और मैंने काफी पैसे भी जोड़ लिये हैं कल मैं बैंक से निकाल कर आपको दे दूंगी आप ले जाना।’’

यह सुनकर उसके पिता बोले – ‘‘नहीं बेटा हम तेरी कमाई कैसे ले सकते हैं तू अपने पास ही रख पर जब भी तू परेशान हो घर आ जाना।’’

अगले दिन सुबह होते ही उसके पिता गांव चले गये। उस दिन सुधा को थोड़ा डर तो लग रहा था। कि कहीं उसकी चोरी पकड़ी न जाये क्योंकि वह महेश के प्यार में पड़ चुकी थी, और गांव में यह सब बहुत बुरा माना जाता है।

महेश उसे लेने आया तो वह उसके साथ ऑफिस के लिये निकल गई। रास्ते में उसने सारी बात बता दी। वह महेश से कुछ नहीं छुपाना चाहती थी।

यह सुनकर महेश हसने लगा वह बोला – ‘‘पगली बस इतनी सी बात बात इसमें डरने की क्या बात है। हम एक दूसरे से प्यार करते हैं कोई गुनाह नहीं किया मैं कुछ दिनों में गांव जाकर तुम्हारे माता पिता से मिल लूंगा।’’

सुधा बोली – ‘‘नहीं नहीं ऐसा मत करना पहले मौका देख कर मैं बात करूंगी।

इसी तरह समय पंख लगा कर उड़ रहा था। महेश के साथ रहते रहते सुधा के तौर तरीके बदल गये थे। अब वह गांव की भोली सी लड़की नहीं शहर की तेज तरार लड़की बन चुकी थी।

सुधा ने काफी पैसे इकट्ठे कर लिये थे। इस बार उसने सोचा क्यों न दिवाली पर मां-पिताजी से मिल आउं। वह ऑफिस से छुट्टी लेकर गांव के लिये निकल गई मां-पिताजी के लिये उसने कपड़े खरीदे शहर से बढ़िया सी मिठाई ली और गांव पहुंच गई।

अचानक बेटी को देख कर सुधा की मां बहुत खुश हुई उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। दोंनो मां बेटी घंटो बातें करती रहीं। फिर उसकी मां उसकी पसंद का खाना बनाने चली गईं। शाम तक उसके पिताजी भी खेत से आ गये थे। सुधा को देख कर वे बहुत खुश हुए, लेकिन जैसे जैसे सुधा उनसे बात कर रही थी उन्हें एहसास हो रहा था कि यह वो सुधा नहीं है जो गांव से शहर गई थी।

अब वह केवल पैसों की बातें करती थी। शहर की चमक दमक की बातें। उसे अब उसके माता पिता बेकार नजर आ रहे थे। सुधा के पिता उसकी बातों को सुनकर असहज महसूस कर रहे थे।

दो दिन बात दिवाली थी। सबने मिल कर दिवाली मनाई। लेकिन सुधा के पिता अपनी बेटी के व्यवहार से खुश नहीं थे। उन्हें लग रहा था। कि अब वह उनकी बेटी नहीं रही।

दिवाली के अगले दिन सुधा अपनी मां के साथ बैठी थी – ‘‘मां कल मैं चली जाउंगी मेरी छुट्टी खत्म हो रही हैं। आपसे एक बात करनी थी। मां मैं एक लड़के से प्यार करती हूं हम दोंनो शादी करना चाहते हैं। आप पिताजी से बात कर लीजिये।’’

‘‘बेटी यह तू क्या कह रही है तेरे पिता सुनेंगे तो बहुत गुस्सा करेंगे। यह सुनकर सुधा बोली – ‘‘मां यह सत्य है आप दोंनो को मानना ही पड़ेगी अब में किसी गांव के लड़के से शादी करके यहां तो रह नहीं सकती। आप मान जाओ तो अच्छा है वरना शादी तो हम वैसे भी कर लेंगे।’’

अपनी बेटी अब पराई सी लगने लगी थी। शाम को सुधा की मां ने उसके पिता को सारी बात बता दी। यह सुनकर उसके पिता बहुत गुस्सा हुए – ‘‘इसी दिन के लिये मैंने तुझे शहर भेजा था कि तू हमारी नाक कटवा दे। यह रिश्ता नहीं हो सकता और न तुझे अब शहर जाने की जरूरत है। मैं कोई ढंग का लड़का देख कर तेरी शादी करा दूंगा।’’

सुधा बोली – ‘‘देखिये पिताजी मैं शादी करूंगी तो महेश से ही करूंगी। मैं आपको शादी का निमंत्रण भेज दूंगी मन करे तो आशीर्वाद देने आ जाना।’’

सुधा की बात सुनकर उसके माता पिता आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। सुधा की मां ने कहा – ‘‘सुनों जी अभी आप गुस्से में हो वो भी उल्टे जबाब दे रही है। सुबह बात कर लेंगे।’’

रात भर दोंनो करवटें बदलते रहे। उनकी आंखों से नींद उड़ चुकी थी। सुबह जब दोंनो उठे तो देखा सुधा एक चिट्ठी छोड़ कर चली गई है। उसमें लिखा था – ‘‘पिताजी मैं इस गांव और यहां के दकियानूसी विचारों को छोड़ कर जा रही हूं। शादी का कार्ड भिजवा दूंगी। आपका मन हो तो आ जाना आशीर्वाद देने।’’

सुधा को अब किसी की परवाह नहीं थी। वह शहर पहुंच गई अगले दिन सुबह वह ऑफिस जाने के लिये तैयार हुई उसे आज महेश को सारी बातें बतानी थीं।

वह महेश का इंतजार कर रही थी। लेकिन वह नहीं आया। न ही सुधा का फोन उठा रहा था। सुधा ऑफिस पहुंची तो भी महेश ने उससे बात नहीं की। वह बहुत परेशान थी। लंच में उसने महेश को रोक लिया –

‘‘क्या बात है तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हो?’’

महेश बोला – ‘‘सुधा अब मेरे तुम्हारे रास्ते अलग अलग हैं मैंने शादी का फैसला कर लिया है मेरा रिश्ता पक्का हो गया। है।’’

यह सुनकर सुधा के पैरों तले जमीन खिसक गई – ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो हम दोंनो शादी करने वाले थे?’’

महेश ने कहा – ‘‘मैंने अपने पापा से बात की थी लेकिन वो नहीं माने और मेरा जिस जगह रिश्ता पक्का किया है वे करोड़पति हैं उनकी इकलौती लड़की है। मैं तो इस ऑफिस से भी रिजाईन दे रहा हूं। शादी के बाद मुझे ही उनका सारा बिजनेस संभालना है और तुमसे शादी करके मुझे क्या मिलता हम दोंनों जिन्दगी भर इसी ऑफिस में घिसते रहते एक एक चीज के लिये तरसते रहते हो सके तो मुझे भूल जाओ।’’

सुधा वहां से उठ कर सीधे अपने बॉस के केबिन में गई और बोली – ‘‘सर मेरी तबियत ठीक नहीं है मुझे हाफ डे चाहिये।’’ उसके बॉस ने उसे छुट्टी दे दी वह अपना बैग उठा कर ऑटो लेकर अपने फ्लेट पर आ गई। आते ही बिस्तर पर लेट गई उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे – ‘‘मेरे साथ ठीक ही हुआ मैंने अपने माता पिता को धोखा दिया बदले में मुझे तो धोखा मिलना ही था। अब किस मुंह से गांव जाउं। मन कर रहा है आत्महत्या कर लूं।’’

शाम को उसने सपना को सारी बात बता दी। सपना समझ गई कि परिस्थिती बहुत नाजुक है सुधा कुछ गलत कदम न उठा ले इसलिये उसने कहा – ‘‘माता पिता आखिर माता पिता ही होते हैं वे तुझे माफ कर देंगे कल सुबह हम दोंनो गांव चलेंगे।’’

सुधा मना करती रही लेकिन सपना उसे लेकर गांव पहुंच गई। घर पहुंचते पहुंचते शाम हो गई थी। सुधा सपना के साथ अपने घर पहुंची। आंगन में उसके माता पिता एक चारपाई पर बैठे थे। सुधा जाते ही अपने पिता के पैरों में गिर गई – ‘‘पिताजी मुझे माफ कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई मैंने आपके सपनों को तोड़ा आपको धोखा दिया उससे बड़ा धोखा मुझे भी मिला। अब मैं कभी शहर नहीं जाउंगी। जहां आप मेरी शादी करेंगे मैं कर लूंगी।’’

सुधा के पिता ने उसे उठाया और गले से लगा लिया – ‘‘बेटा सब भूल जा जो बीत गया उस पर पछतावा करने की जरूरत नहीं। मेरी बेटी मुझे वापस मिल गई इससे बड़ी कोई बात नहीं है।’’

सोमवार, 11 अगस्त 2025

चेलाराम की कहानी

 एक विदेश में रहने वाले भारतीय परिवार की छोटी सी कहानी: एक भारतीय परिवार, जिसमें माता-पिता और एक बेटी शामिल है, बेहतर जीवन की तलाश में विदेश जाता है। विदेश में, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि घर का काम, महंगाई, और नौकरी की तलाश 

कहानी में, चेलाराम अपनी पत्नी और बेटी के साथ विदेश जाता है। कुछ समय बाद, उन्हें सच्चाई का सामना करना पड़ता है। घर के काम के लिए, वे एक घरेलू सहायिका को रखते हैं, जिसका नाम रीटा है। विदेश में, चेलाराम की पत्नी गौरी को नौकरी नहीं मिलती, इसलिए रीटा घर का सारा काम करती है। चेलाराम और गौरी को महसूस होता है कि विदेश में महंगाई बहुत है। सब्जियां बहुत महंगी हैं और बच्चों की पढ़ाई भी महंगी है। पुलिस भी अक्सर उनका चालान काटती है। एक दिन, मकान मालिक उनसे 30000 रुपये किराया मांगता है, जबकि उनका समझौता 25000 रुपये का था। पैसे देने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं होता। 
यह कहानी विदेश में रहने वाले भारतीयों के सामने आने वाली चुनौतियों और कठिनाइयों को दर्शाती है। यह कहानी दिखाती है कि विदेश में जीवन हमेशा आसान नहीं होता, और वहां भी लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

रविवार, 10 अगस्त 2025

भूतों का घर लोक कथा की कहानी

 

सरदार नंदेश्वर स्टिक्स नदी के किनारे जहाँ वह झील में गिरती थी अपने लोगों में शान्ति से रहता था।

उस गाँव के लोग सारे दिन काम में लगे रहते थे। लड़ाई लड़ने वाले शिकार करते थे और मछलियाँ पकड़ते थे। स्त्रियाँ घर में खाना बनाती थीं और बड़े लोगों और बच्चों की देखभाल करती थीं।

इस तरह से सब अपना अपना काम करते हुए अपने प्राकृतिक वातावरण में शान्ति से रहते थे।

एक दिन सरदार नंदेश्वर ने अपने गाँव के दक्षिण के एक गाँव में जाने का विचार किया। वह सुबह सुबह ही निकल पड़ा। उसको नाव से झील पार करनी थी और फिर कुछ दूर पैदल अपने दोस्त के घर तक जाना था।

उस दोस्त के घर उसको रात को रुकना था और अगले दिन फिर अपने घर वापस आने के लिये अपना सफर शुरू करना था।

वह अभी झील के किनारे से कुछ गज दूर ही गया होगा कि उसको किसी जानवर के बहुत ज़ोर से चिल्लाने की आवाज आयी और उस चिल्लाहट के साथ ही एक बहुत बड़ा भालू पास की झाड़ियों में से निकल कर उसके सामने आ खड़ा हुआ।

सरदार नंदेश्वर हथियारबन्द था। उसके पास अपना लड़ने वाला डंडा था और वह शिकारियों वाली पोशाक भी पहने था पर क्योंकि भालू उसका टोटम (object, or symbol representing an animal or plant) था इसलिये वह भालू को मार नहीं सकता था सो वह उलटे पैरों अपनी नाव की तरफ जो झील के किनारे बँधी थी भाग लिया ताकि वह वहाँ से भाग सके।

पर उसी समय वह भालू गुस्से में भर कर उस सरदार के ऊपर कूद पड़ा और उसको जमीन पर गिरा दिया।

सरदार नंदेश्वर के पास अब उस भालू से लड़ने अलावा और कोई चारा नहीं था सो उसने अपना लड़ने वाला डंडा उठाया और उससे भालू को बार बार पीट कर उसको अपने से दूर करने की कोशिश करने लगा।

जैसे जैसे ताकतवर भालू और उस सरदार में लड़ाई होती जाती थी घावों से निकला बहुत सारा खून जमीन पर बिखरता जाता था। आखिर सरदार ने अपना चाकू निकाल लिया और उससे भालू के सिर और गले पर बार बार मारना शुरू किया ताकि वह उसकी पकड़ से छुटकारा पा सके। भालू ने भी एक ज़ोर की चीख के साथ सरदार को छोड़ दिया।

सरदार नंदेश्वर वहाँ से हट गया और जमीन पर गिर पड़ा। उसका शरीर काफी घायल हो गया था। उसके घाव बहुत गहरे थे। उसने बड़ी मुश्किल से करवट बदली और अपने दुश्मन की तरफ देखा – अपने टोटम का सिर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ ही पलों में वह भी मर गया।

उस सरदार के दोस्त को सरदार के इस इरादे के बारे में कुछ पता नहीं था कि वह उसके घर ठहरने वाला था सो वह इस घटना के बारे में कुछ नहीं जानता था।

दो दिन बाद उसको झील के पास एक भालू का मरा हुआ शरीर मिला और सरदार की नाव झील के किनारे बँधी हुई मिली। सरदार नंदेश्वर का खून से सना वह लड़ाई वाला डंडा और टोटम और चाकू उसकी दुख भरी कहानी कह रहे थे।

सरदार के शरीर का कहीं कोई नामो निशान नहीं था पर वहाँ भेड़ियों के पैरों के निशान बता रहे थे कि उसके दोस्त को भेड़ियों ने घसीटा था।

सो सरदार नंदेश्वर के दोस्त ने कई लड़ने वाले बुलाये और उनको अपने दोस्त का शरीर खोजने के लिये चारों तरफ भेजा।

वे सब बहुत दिनों तक सरदार को ढूँढते रहे पर सरदार का शरीर कहीं नहीं मिला।

करीब एक महीने बाद पूरे चाँद की रात को सरदार नंदेश्वर के लोगों ने पास की पहाड़ी के पास से एक अजीब सा कोहरा ऊपर उठता देखा जैसे आग से धुँआ उठता है।

सारा वातावरण साफ था रात भी दिन की तरह चमक रही थी पर फिर भी वह कोहरा घना हो कर उनकी आँखों के सामने खड़ा हो गया था और वहीं ठहर गया।

वहाँ उस जगह तेज़ हवा के होते हुए भी वह कोहरा ऊपर उठ रहा था और पेड़ों को हिला रहा था। पूरा गाँव इसको देख कर आश्चर्यचकित खड़ा था और सोच रहा था कि वह उनके सामने क्यों प्रगट हुआ।

उस रात सरदार अपने दवा वाले डाक्टर के सपने में आया और उससे बोला — “यह मैं हूँ जो कोहरे के रूप में प्रगट हुआ था। मैंने एक बड़े भालू को मार डाला है जिसने मुझे मारा इसलिये मुझे अब कभी भी आत्माओं की दुनियाँ में घुसने नहीं दिया जायेगा।

बजाय धरती पर घूमने के मैं अपने लोगों के पास रहना ज़्यादा पसन्द करूँगा इसलिये मैंने उस पहाड़ी पर उस जगह पर एक आत्मा का घर बना लिया है जो तुमने आज देखा।”

फिर सरदार ने उस दवा वाले डाक्टर से वायदा किया कि वह हमेशा अपने गाँव वालों के साथ रहेगा ताकि वे घर से जाते समय और घर लौटते समय दोनों समय सुरक्षित रहें।

अगर उनको उसके होने में कोई शक हो तो वे उस पहाड़ी की तरफ देख लें। वह जो कोहरा उस पहाड़ी पर से ऊपर की तरफ उठ रहा था वह उसकी उस आत्मा के घर से ही उठ रहा था। इस से उनको यकीन हो जायेगा कि उसकी आत्मा हमेशा उनके साथ रह रही थी।

अगली सुबह उस दवा वाले डाक्टर ने सरदार का सन्देश सब गाँव वालों को सुना दिया। सबको यह सुन कर बहुत खुशी हुई कि उनका प्यारा सरदार काकाहेला अभी भी उनके साथ ही था।

बहुत सारे लोग उस कोहरे को देख कर खूब ज़ोर से चिल्लाते तो वह कोहरा हमेशा उन आवाजों का जवाब देता – उनकी आवाज गूँज कर उनके पास आ जाती।

आज भी सरदार काकाहेला की आत्मा का घर उस पहाड़ी पर ठंड के मौसम में उठता हुआ देखा जा सकता है। और अगर कोई प्रेम से उसको पुकारता है तो उसकी आवाज गूँज कर उसी के पास आ जाती है यह बताने के लिये कि सरदार ने उसकी आवाज सुन ली है।

भूतों का घर लोक कथा की कहानी

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

जादुई किताब वाली कहानी

 गाँव में, रामू नाम का एक लड़का रहता था। रामू को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। एक दिन, उसने गाँव के पुस्तकालय में एक पुरानी, ​​धूल भरी किताब देखी। उसने किताब खोली और पढ़ना शुरू किया। कहानी एक जादुई जंगल के बारे में थी, जहाँ पेड़ बातें करते थे और नदियाँ सुनहरी थीं। रामू कहानी में इतना खो गया कि उसे समय का पता ही नहीं चला। &&&


अद्भुत कहानी .....जैसे ही उसने कहानी का आखिरी पन्ना पलटा, कमरे में एक हल्की सी गड़गड़ाहट हुई। रामू ने ऊपर देखा और देखा कि पुस्तकालय की खिड़की खुली हुई है, और एक सुनहरी रोशनी कमरे में आ रही है। रोशनी से एक छोटा, पंखों वाला प्राणी बाहर निकला। यह प्राणी बिल्कुल वैसा ही था जैसा रामू ने कहानी में पढ़ा था। &&&&
प्राणी ने रामू से कहा, "मैं जादुई जंगल का दूत हूँ। तुमने मेरी कहानी पढ़ी, और तुमने इसे सच्चे दिल से महसूस किया। इसलिए, मैं तुम्हें अपने जंगल में आमंत्रित करता हूँ।" &&&
रामू खुशी से उछल पड़ा। उसने प्राणी का हाथ पकड़ा, और वे दोनों जादुई जंगल की ओर उड़ गए। वहाँ, रामू ने कई अद्भुत चीजें देखीं - बातें करने वाले पेड़, सुनहरी नदियाँ, और जादुई जानवर। उसने जंगल के लोगों के साथ दोस्ती की, और वे सब मिलकर खुशी से रहने लगे। &&&
रामू ने सीखा कि किताबें हमें दुनिया की सीमाओं से परे ले जा सकती हैं, और हमें नए और अद्भुत अनुभवों का पता लगाने में मदद कर सकती हैं।&&&& 
यह कहानी हमें सिखाती है कि कल्पना और ज्ञान में अद्भुत शक्ति होती है। &&&
आप यह वीडियो देखकर एक और अद्भुत कहानी सुन सकते हैं

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

सोना बनाने वाले राजा की कहानी

 

राजा मिडास का स्पर्श

Midas and the Golden touch

आपने बचपन में अपने स्पर्श से सोना बनाने वाले राजा की कहानी सुनी है । ग्रीस (यूनान) में मिडास नाम का एक राजा था। उसे सोने से बहुत प्रेम था। उसके पास बहुत सारा सोना था और जितना सोना वह जमा करता जाता था उतना ही ज्यादा सोना पाने का उसका लालच बढ़ता जाता था। अपने खजाने में बैठकर वह अपना पूरा समय सोना गिनने में लगाता था। एक दिन जब वह सोना गिनने में व्यस्त था तब भगवान प्रकट हुए और मिडास से बोले कि वह उसकी कोई मनोकामना पूरी कर सकते हैं। मिडास यह सुनकर बहुत खुश हो गया और बोला, “मैं जिस चीज को स्पर्श कर लूँ वह सोने की हो जाए!” भगवान ने कहा, “ऐसा ही हो, कल सुबह उठने के बाद तुम जो कुछ स्पर्श करोगे वह सोने में बदल जाएगा”। अगले दिन जब राजा सो कर उठा, उसने अपने पलंग को छुआ, और पलंग सोने का हो गया। उसके कपड़े, उसके बर्तन, उसकी तलवार, अब कुछ सोने का हो गया। फिर वह नाश्ता करने बैठा लेकिन जैसे ही उसने फलों को हाथ लगाया, वे भी सोने के बन गए। पीने का पानी भी सोने में बदल गया। मिडास को बहुत तेज भूख लग रही थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। इतने में ही उसकी बेटी भागती हुई उसके पास आई और उसे परेशान देखकर उसके से लग गई। मिडास को छूते ही वह भी सोने के बुत में तब्दील हो गई। अब मिडास दहाडें मारकर रोने लगा। उसे अपनी बेवकूफी पर बहुत पछतावा हुआ। उसे यह समझ आ गया था कि सोना संसार की सबसे अच्छी चीज नहीं है। उसने भगवान को पुकारा । भगवान ने फिर प्रकट होकर पूछा, “मिडास, क्या तुम इतना सारा सोना पाकर खुश हो?” मिडास ने कहा, “नहीं! मैं संसार का सबसे दुखी मनुष्य हूँ। मुझे माफ कर दो। मेरा सब कुछ ले लो लेकिन मेरी बेटी को पहले जैसा बना दो। मैं उसे ही सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ, सोने को नहीं!” भगवान ने उसकी बात सुनकर कहा, “ठीक है मिडास, तुम समझ गए हो कि सोना संसार की सबसे कीमती वस्तु नहीं है।” ऐसा कहकर भगवान ने अपने वरदान को उल्टा कर दिया। मिडास की बाँहों में उसकी प्यारी बेटी पहले की तरह अठखेलियाँ करने लगी और उसने कभी न भूलनेवाला सबक सीख लिया।

सोमवार, 4 अगस्त 2025

मोनू का जन्मदिन एक कहानी


 आज मोनू का जन्मदिन था। वह आज पूरे नौ वर्ष का हो गया था। सुबह तैयार होकर वह पिताजी के साथ मंदिर गया। रास्ते में उसने एक आदमी को गाय की पूजा करते देखा। मंदिर के बाहर एक औरत पीपल के पेड़ की पूजा कर रही थी। पुजारी जी सूरज को जल चढ़ा रहे थे। मोनू ने मंदिर में भगवान की पूजा की। मंदिर से लौटते समय उसने अपने पिताजी से पूछा, “पापा, हम जानवरों, पेड़-पौधों, सूरज और चाँद की पूजा क्यों करते हैं?


“अच्छा सवाल है, क्यों न हम मिलकर इसका जवाब ढूंढे?” पिताजी बोले।


मंदिर से आकर मोनू पिताजी के साथ अपने जन्मदिन की पार्टी का सामान लेने बाज़ार गया। उन्होंने गुब्बारे, मोमबत्तियाँ और सजावट का सामान लिया।


माँ ने मटर-पनीर की सब्जी बनाने के लिए पनीर मँगवाया था। इसलिए वे दोनों दूध की डेयरी पर पनीर लेने गए।


“पर यहाँ तो दूध मिलता है ना पापा!,” मोनू ने पूछा।


“हाँ, और पनीर भी मिलता है, पनीर दूध से ही तो बनता है,” पापा बोले।



तभी वहाँ एक आदमी आया और बोला मुझे दही बनाने के लिए एक लीटर दूध देना।


“वाह! दही भी दूध से बनता है,” मोनू ने सोचा।


मोनू और पिताजी फिर आइसक्रीम खरीदने गए। आइसक्रीम वाले ने कहा कि आज हमारा दूध फट गया। इसलिए आइस-क्रीम नहीं बन पाई।


पिताजी बोले, “उदास मत हो बेटा, चलो हम दूसरी दुकान से आइसक्रीम ले आते हैं।“ वे दूसरी दुकान पर गए और मोनू की मनपसंद मैंगो आइसक्रीम ली।


अरे! हम मिठाइयाँ लेना तो भूल ही गए। चलो जल्दी मिठाई की दुकान पर चलते हैं। वे मिठाई खरीद ही रहे थे की तभी वहाँ एक दूधवाला आया जिसने दुकानदार को बहुत-सा दूध दिया।


“पापा एक ही दूध से कितनी सारी चीज़ें बनती है- दही, पनीर, मक्खन, मिठाइयाँ और आइसक्रीम भी।” मोनू बोला।


“हाँ, कमाल है ना।” पिताजी बोले।


मोनू बोला, “लगता है मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया जैसे इन सभी चीज़ों के अलग-अलग रूप और नाम हैं पर वे बने तो एक ही चीज़ के हैं। वैसे ही इंसान-पेड़, पौधे, और जानवर दिखते अलग-अलग हैं पर सबमें वही एक भगवान हैं।”

तोतला बेटा...

 मां  अपने तोतले बेटे से कहा।      बेटा  आज हम जहां, लड़की देखने जा रहें हैं। तुम वहां बोलना मत ।     वर्ना  वह लोग भी मना कर देंगे।    बेटा...

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